मसाले पीसने वाले सील-पत्थर से वार कर ली थी पति संतोष भगत की जान; द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश बलराम कुमार देवांगन ने सुनाया कठोर फैसला, अपर लोक अभियोजक श्रीमती पुष्पा सिंह की अकाट्य पैरवी से मुकाम तक पहुँचा न्याय
कुनकुरी: पवित्र वैवाहिक बंधन और सामाजिक संवेदनाओं को तार-तार कर देने वाले जशपुर जिले के सबसे खौफनाक ‘संतोष भगत हत्याकांड‘ में आखिरकार कानून का अंतिम हथौड़ा चल गया है। अपनी ही जीवनसंगिनी द्वारा घरेलू विवाद के बाद पति की सिर कुचलकर नृशंस हत्या करने और फिर लाश को सूटकेस में ठूंसकर छिपाने की दिल दहला देने वाली वारदात में न्यायालय द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश बलराम कुमार देवांगन, कुनकुरी ने न्याय का ऐतिहासिक दृष्टांत प्रस्तुत किया है।
विद्वान अदालत ने आरोपी पत्नी मंगरीता भगत (45 वर्ष) को संगीन हत्या और सबूत मिटाने का दोषी ठहराते हुए सश्रम आजीवन कारावास तथा अर्थदंड की कठोर सजा सुनाई है।
न्यायाधीश का सख्त मंतव्य: “पारिवारिक मूल्यों का पतन, समाज के लिए चुनौती”
दंडादेश के प्रश्न पर सुनवाई करते हुए पीठासीन अधिकारी द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश श्री बलराम कुमार देवांगन ने अपने विस्तृत निर्णय में अपराध की विभत्सता और पारिवारिक रिश्तों में घटती संवेदनाओं पर अत्यंत गंभीर और गहरी चिंता व्यक्त की।
“अभियुक्ता द्वारा अपने ही पति के सिर और कान के पास भारी सील-पत्थर से प्राणघातक वार कर हत्या कारित करना तथा तत्पश्चात शव को सूटकेस में डालकर साक्ष्य मिटाने का प्रयास करना केवल एक आपराधिक कृत्य नहीं है, बल्कि यह समाज में घटती मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक मूल्यों के क्षरण का भयावह संकेत है। यह कृत्य संपूर्ण सामाजिक ताने-बाने के लिए एक खुली चुनौती है, जिसे किसी भी दृष्टिकोण से क्षमा नहीं किया जा सकता।”
— श्री बलराम कुमार देवांगन, द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश, कुनकुरी
अपर लोक अभियोजक श्रीमती पुष्पा सिंह की प्रभावकारी एवं अकाट्य पैरवी
इस जटिल, संवेदनशील और पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) पर आधारित हत्याकांड को अंजाम तक पहुँचाने में अपर लोक अभियोजक श्रीमती पुष्पा सिंह की दूरदर्शी, कानून-सम्मत और आक्रामक पैरवी की निर्णायक भूमिका रही। चूंकि वारदात बंद कमरे के भीतर हुई थी और कोई सीधा आंखों देखा गवाह (Eye-Witness) मौजूद नहीं था, इसलिए अभियोजन पक्ष के सामने कड़ियों को जोड़ने की कठिन चुनौती थी।
अपर लोक अभियोजक श्रीमती पुष्पा सिंह ने अदालत के समक्ष बेहद तार्किक ढंग से प्रतिपादित किया कि विवेचना के दौरान जुटाए गए फॉरेंसिक (FSL) साक्ष्य, क्युरी रिपोर्ट, मेमोरेंडम जप्ती और डॉक्टरी साक्ष्य मिलकर एक ऐसी मजबूत व निर्बाध श्रृंखला (Chain of Circumstances) बनाते हैं, जो केवल और केवल आरोपी पत्नी मंगरीता भगत के अपराध की ओर अचूक संकेत करती है। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि ऐसे जघन्य अपराध में आरोपी के प्रति किसी भी प्रकार की उदारता समाज में गलत संदेश देगी, जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए कठोरतम सजा सुनाई।
घटना का भयावह घटनाक्रम: विवाद से लेकर लाश छिपाने तक का राज
अभियोजन द्वारा अदालत में प्रस्तुत मामले के अनुसार, पूरी वारदात का दर्दनाक खुलासा तब हुआ जब मृतक के परिजनों ने बंद घर का ताला खोला। घटना की मुख्य कड़ियाँ इस प्रकार सामने आईं:
विवाद और हत्यात्मक हमला (07 नवंबर 2025): रात्रि 10:00 से 11:00 बजे के मध्य ग्राम भिंजपुर स्थित मकान में आरोपी मंगरीता भगत का अपने पति संतोष भगत से विवाद हुआ। आवेश में आकर आरोपी ने रसोई घर में रखे मसाले पीसने वाले भारी सील-पत्थर (वजन 16.44 किग्रा) से पति के कान व सिर पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया। वार इतना भयावह था कि सिर के भीतर खोपड़ी की हड्डी (Base of Skull) टूट गई और अत्यधिक खून बहने से मौके पर ही दम तोड़ दिया।
साक्ष्य मिटाने की साजिश और सूटकेस में शव: पति की मौत के बाद आरोपी ने बड़ी बेरहमी और ठंडे दिमाग से साक्ष्य मिटाने की साजिश रची। उसने फर्श पर फैले खून को कपड़े (पैरदानी) से पोंछकर धोया। इसके बाद उसने मृतक के शव को मोड़कर घर के अंदर रखे लाल रंग के बड़े ट्रॉली सूटकेस (लम्बाई 2.5 फीट, चौड़ाई 1.5 फीट, गहराई 10 इंच) में ठूंस दिया और अपनी खून से सनी नाइटी छिपा दी।
भांपी गई आशंका और खुलासा (09 नवंबर 2025): मृतक की बेटी अनुराधा भगत (जो कोरबा में रहती थी) जब अपने पति के साथ मायके पहुँची और घर पर ताला लटकता पाया, तो बड़े पिता विनोद मिंज को बुलाया गया। ताला तोड़कर कमरे में जाने पर वहां आधा खुला सूटकेस दिखा, जिसमें से संतोष भगत का सड़ता हुआ शव बाहर झांक रहा था। इसके तुरंत बाद दुलदुला पुलिस को सूचित किया गया।
वैज्ञानिक जांच, FSL और मेडिकल रिपोर्ट जिसने खोला कानून का शिकंजा
थाना दुलदुला के विवेचक निरीक्षक कृष्ण कुमार साहू द्वारा नए आपराधिक कानूनों के तहत निष्पक्ष और पारदर्शी विवेचना की गई, जो अदालत में दोषसिद्धि का मुख्य आधार बनी:
ई-साक्ष्य ऐप और डिजिटल साक्ष्य: नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत पुलिस ने सूटकेस से शव निकालने तथा मेमोरेंडम के आधार पर भारी सील-पत्थर और कपड़ों की जप्ती प्रक्रिया की ‘ई-साक्ष्य ऐप’ से डिजिटल वीडियोग्राफी कराई और धारा 63(4)(c) का प्रमाण पत्र अदालत में पेश किया।
पोस्टमॉर्टम व क्युरी रिपोर्ट: सीएचसी दुलदुला के चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. सिलास केरकेट्टा (अ.सा.-05) ने पोस्टमार्टम में पाया कि मृतक के मस्तिष्क के दाहिने टेपोरल लोब में गंभीर चोट व खोपड़ी की हड्डी टूटी थी। उन्होंने अपनी क्युरी रिपोर्ट (Pr.P-18) में पुष्टि की कि 16.44 किग्रा वजन के सील-पत्थर से ही यह प्राणघातक चोटें आई थीं और मौत पूरी तरह “हत्यात्मक” (Homicidal) थी।
FSL अम्बिकापुर की साइंटिफिक पुष्टि: क्षेत्रीय न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) अम्बिकापुर की रिपोर्ट (Pr.P-27) में जप्तशुदा लाल ट्रॉली सूटकेस, सील-पत्थर, आरोपी की नाइटी और फर्श पोंछने के कपड़े पर ‘मानव रक्त’ (Human Blood) पाए जाने की पुष्टि हुई, जिसने बचाव पक्ष की हर दलील खारिज कर दी।
कानूनी सिद्धांत एवं न्यायालय के महत्वपूर्ण निष्कर्ष
विचारण के दौरान बचाव पक्ष द्वारा प्रत्यक्षदर्शी के अभाव और जांच में त्रुटियों का तर्क दिया गया। परंतु न्यायाधीश श्री बलराम कुमार देवांगन ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायदृष्टांतों का हवाला देते हुए बचाव के तर्कों को पूरी तरह निराधार करार दिया:
धारा 106 भारतीय साक्ष्य अधिनियम का अनुप्रयोग: अदालत ने माना कि चूंकि घटना बंद मकान के भीतर हुई जहाँ केवल पति-पत्नी मौजूद थे, अतः धारा 106 (विशेष ज्ञान वाले तथ्य का साबित करने का भार) के तहत आरोपी पत्नी का यह कानूनी दायित्व था कि वह बताए कि उसके पति की मृत्यु कैसे हुई। आरोपी कोई भी तर्कसंगत स्पष्टीकरण देने में पूरी तरह विफल रही।
परिस्थितियों की निर्बाध श्रृंखला: सर्वोच्च न्यायालय के लैंडमार्क प्रकरण ‘शरद बिरधीचंद शारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य‘ तथा ‘त्रिमुख मारोती किरकन बनाम महाराष्ट्र राज्य‘ के सिद्धांतों का पालन करते हुए अदालत ने पाया कि साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी तरह पूर्ण है, जो केवल आरोपी मंगरीता भगत के दोषी होने का निष्कर्ष निकालती है।
सजा का पूर्ण ब्योरा
| अपराध (BNS, 2023) | दोषसिद्धि का विवरण | सजा (कारावास) | अर्थदंड व व्यतिक्रम सजा |
| धारा 103(1) BNS | पति संतोष भगत की हत्या कारित करना | सश्रम आजीवन कारावास | ₹1,000 अर्थदंड (अदा न करने पर 06 माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास) |
| धारा 238(क) BNS | साक्ष्य विलोपन (शव सूटकेस में छिपाना) | 03 वर्ष का सश्रम कारावास | ₹500 अर्थदंड (अदा न करने पर 01 माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास) |

