12 जनवरी स्वामी विवेकानंद जी की जन्म तिथि पर विशेष लेख
खेल आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक दृढ़ता के लिए जरूरी
इस जगत के सभी मनुष्यों ने जीवन में खेल के महत्व को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है। खेलकूद का अंत जय या पराजय होता है। लेकिन उसका प्रभाव जीवन में गहरा होता है। खिलाड़ी मैदान में प्रतिद्वदी से भिड़ने के लिए उतरता है तो सबसे पहले वह ईश्वर से संघर्ष करने की कौशलता और मुकाबला करने में सक्षम होने की प्रार्थना करता है। बाद में तकनीक और रणनीति के बदलाव के साथ विपक्ष की चुनौती को स्वीकार करता है। अत: खेल प्रतिस्पर्धा में आध्यात्म का विशेष महत्व होता है।
भारत के महान युवा सम्राट स्वामी विवेकानंद जी भी खेलकूद के लिए आध्यात्म को महत्व देते हैं। बहुत कम लोगों को मालूम है कि स्वामी जी खुद एक अच्छे क्रिकेट खिलाड़ी थे। एक उदाहरण का उल्लेख इतिहास में मिलता है जब ब्रिटिश टीम के विरुद्ध स्थानीय भारतीय क्रिकेट टीम की ओर से खेलते हुए आज से करीब 138 वर्ष पूर्व कोलकाता के ईडन गार्डन मैदान में सात अंग्रेज बल्लेबाजों को आऊट किया था। इस तरह उन्होंने साबित किया कि दो राष्ट्रों की टीम के बीच होने वाले मुकाबले के द्वारा राष्ट्रवाद की भावना उदय होती है तथा प्रतिद्वंदी को पराजित करने से आत्मबल मिलता है।
स्वामी विवेकानंद जी के खेलकूद के बारे में अलग से कोई स्पष्ट विचार नहीं मिलता हैं परंतु उनके भाषणों और लेख आदि के संग्रह से स्पष्ट हो जाता है कि वे यह मानते थे कि खेल में भागीदारी से व्यक्ति ज्यादा आध्यात्मिक होता है। उन्होंने कहा जब आप प्रार्थना करते हैं तो आप बहुत सारी चीजें सोच सकते हैं परंतु जब आप फुटबाल में किक मारते हैं तो पूरी एकाग्रता से ऐसा करते हैं और एकग्रता के द्वारा आप जल्द से जल्द ईश्वर के नजदीक पहुंच जाते हैं। अत: खेल आपके भीतर यह समझ लाता है कि सफलता के लिए सहभागिता का क्या महत्व है?
विवेकानंद जी ने कहा खेलकूद की प्रतियोगिता में सफलता के लिए मजबूत शरीर और स्वस्थ मस्तिष्क का होना जरूरी है। जो कि आध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसी वजह से खेल के मैदान में एक दूसरे का सामना करने से एकाग्रता, अनुशासन तथा वीरता को सीखने का अवसर मिलता है। स्वामी के विचार इस दिशा में एकदम साफ था कि युवाओं को शारीरिक मजबूती के लिए खेलों को अपनाना चाहिए क्योंकि शारीरिक शक्ति के बिना व्यक्ति आध्यात्मिक ऊंचाईयां को नही पा सकता है। विवेकानंद जी चाहते थे कि प्रत्येक युवा को साहसी और अनुशासन का पालन करने वाला होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि गीता के संदेश को समझने के लिए फुटबाल मैच का बहुत अर्थ होता है क्योंकि ऐसे मुकाबले उन्हें वीरता और त्याग का भाव सिखाते हैं। स्वामी जी शिक्षा में व्यायाम,खेलकूद के साथ भजन और ध्यान को शामिल करने के पक्षधर थे। युवाओं को खेलकूद में प्रतिभागी होने पर वे जोर देते थे क्योंकि उनका मानना था कि खेल जीवन को आनंदमय और तनावमुक्त बनाता है जिससे व्यक्ति सीमाओं से ऊपर उठकर जीने की कला सीखते हैं।
अत: हम कह सकते हैं कि स्वामी विवेकानंद के लिए खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि युवाओं में आध्यात्म की भावना को बढ़ावा देता है उन्हें मानसिक रूप से साहसी बनाता है तथा जीवन में अनुशासन के के महत्व को समझाता है। इन गुणों के होने से युवा को जीवन के गहरे अर्थों को समझने और लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद मिलती है।
— जसवंत क्लॉडियस
वरिष्ठ खेल पत्रकार
रायपुर, छत्तीसगढ़

