वरिष्ठ खेल पत्रकार जसवंत क्लॉडियस की दोटूक कलम: “महिला खिलाड़ियों के यौन उत्पीड़न और पक्षपात की शिकायतों पर अब सिर्फ़ जांच नहीं, कठोर कार्रवाई का समय”

वरिष्ठ खेल पत्रकार जसवंत क्लॉडियस की दोटूक कलम: “महिला खिलाड़ियों के यौन उत्पीड़न और पक्षपात की शिकायतों पर अब सिर्फ़ जांच नहीं, कठोर कार्रवाई का समय”

नारी को कमजोर समझने की मानसिकता से होगा उबरना

महिला हाकी खिलाड़ियों द्वारा यौन उत्पीड़न और पक्षपात की शिकायत को गंभीरता से लेना होगा

आलेख .. जसवंत क्लॉडियस, वरिष्ठ खेल पत्रकार, टीवी कमेंटेटर. रायपुर.छ ग.

रायपुर : अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक परिषद के निर्देश में समाज के सभी वर्गों विशेषकर युवक, युवती, महिला, पुरुष को खेल कूद में समान अधिकार और अवसर दिये जाने का उल्लेख है। अब तो ट्रांसजेंडर, दिव्यांग वर्ग में योग्यता रखने वाले सभी खिलाड़ियों को खेल स्पर्धाओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। परिस्थितियों के कारण हमारे देश में भी केंद्र सरकार और राज्य सरकारों में पुरुष महिला दोनों ही वर्गों के प्रतिभागियों को मुकाबले में उतरने बराबरी का अधिकार दिया गया है। खेल चाहे जो भी हो मगर मान्यता प्राप्त है तो महिला व पुरुष दोनों वर्ग के खिलाड़ी व्यक्तिगत रूप से या टीम के रूप में भाग ले सकते हैं। अब तो समय के बदलाव के साथ मिश्रित युगल, मिश्रित रिले के मुकाबले एथलेटिक्स, बैडमिंटन, टेनिस,तैराकी आदि खेलों के इवेंट शुरू हो गये हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 2014 से भारत की बागडोर संभालने के पश्चात दोनों ही वर्गों के प्रतिभा संपन्न खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के लिए लगातार बराबर की सुविधा दिए जाने की दिशा में विशेष ध्यान दिया जा रहा है। भारतीय ओलंपिक संघ के गठन में सीधे तौर पर राजनीतिज्ञों का हस्तक्षेप नहीं होता है फिर भी भारतीय ओलंपिक संघ के पूरे भारत के विभिन्न राज्यों के खेल पदाधिकारियों ने एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भारतीय ओलंपिक संघ की बागडोर 2022 में एक महान महिला एथलीट पी.टी.उषा को सौंप दी तथा वे स्वतंत्र भारत के इतिहास की पहली व एकमात्र महिला ओलंपिक अध्यक्ष बनी. लड़कियों, युवतियों, महिलाओं को खेलकूद में आने आने की पूरी कोशिश भारत में 20वीं सदी के अंतिम दशक में आरम्भ हुई तो हमारे देश की नारियों ने 21वीं सदी के आरंभ में विश्व स्तर पर भारत का नाम रौशन करना आरंभ भी कर दिया।

भारोत्तोलन में के.मल्लेश्वरी, बैडमिंटन में सायना नेहवाल, पी.व्ही. सिद्धू, मुक्केबाजी में एम.सी. मेरीकाम, एल. बोरगहेन, टेनिस में सानिया मिर्ज़ा, कुश्ती में साक्षी मलिक, शतरंज में कोनेरु हंपी, क्रिकेट में स्मृति मंधाना, मिथाली राज, हरमनमीत कौर, एथलेटिक्स में पी.टी. उषा, अंजू बॉबी जार्ज, दीपा मलिक, हॉकी में दीप ग्रेस एक्का, सलीमा टेट, निशानेबाजी में मनु भाकर, तीरंदाजी में दीपिका कुमारी, कुश्ती में गीता फोगाट, जिम्नास्टिक में दीपा करमाकर, तलवारबाजी में सी ए भवानी देवी, जूडो में गरिमा चौधरी आदि अनेक महिला खिलाड़ियों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रौशन किया है। महिला खिलाड़ियों के आगे बढ़ने से उनके साथ पुरुष कोच या खेल संघ के पदाधिकारियों के द्वारा दुर्व्यवहार और यौन शोषण की घटनाएं उभर कर आ रही है। इस तरह की वारदात होना शर्मनाक हैं। परंतु पीड़ित को न्याय नहीं मिलना असभ्यता का प्रतीक है।

उल्लेखनीय बात तो यह है कि ऐसे प्रकरण वर्ष 1990 तक सुनने में भी नहीं आते थे। परंतु जैसे- जैसे लड़कियों, महिलाओं ने विभिन्न खेलों में भाग लेना आरंभ किया यौन उत्पीड़न,पक्षपात चयन में उपेक्षा की बातें आने लगी। पिछले 2017 से 2025 तक प्रशिक्षकों, चयनकर्ताओं, खेल संघ के पदाधिकारियों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर की महिला खिलाड़ियों के साथ असहनीय व्यवहार किए जाने की 70 से अधिक शिकायत हो चुकी है। अभी हाल ही में महिला हाकी टीम की पूर्व कप्तान असुंना लकड़ा द्वारा खेल पदाधिकारियों और प्रशिक्षकों द्वारा महिला हाकी खिलाड़ियों के साथ अनैतिक व्यवहार की जानकारी केंद्रीय खेल मंत्रालय तथा झारखंड सरकार को दी गई है। परंतु अभी तक दोषियों के विरूद्ध की गई कार्यवाही की कोई जानकारी केंद्रीय खेल मंत्रालय, भारतीय खेल प्राधिकरण या झारखंड सरकार द्वारा नहीं दी गई है। इस तरह की अधिकतर शिकायत एथलेटिक्स, जिमनास्टिक्स, भारोत्तोलन, सायकलिंग, कुश्ती, हाकी के खिलाड़ियों द्वारा की गई है। भारत सरकार देश में महिला सशक्तिकरण द्वारा महिलाओं को उच्च स्थान देने प्रयासरत हैं तो फिर उनके साथ अनुचित रूख क्यों अपनाया जाता है।

कार्य स्थल पर महिलओं की सुरक्षा के लिए 2013 में पी.ओ. एस.एच. एक्ट भारत में लागू है। फिर भी पुरुष वर्ग द्वारा उनसे दुर्व्यवहार किया जाना निंदनीय है। ऐसा लगता है अब तक यौन उत्पीड़न या पक्षपात की घटना इसलिए बढ़ रही है क्योंकि शिकायतों की उचित मंच पर सुनवाई नहीं होती है। महिला खिलाड़ियों के प्रति पुरुष प्रशिक्षकों, खेल पदाधिकारियों का रवैय्या इसी तरह रहा और शासन, प्रशासन उदासीन रहा तो आगे चलकर खिलाड़ियों के अभिभावक या माता-पिता यह सोचने पर मजबूर हो सकते हैं कि अपनी बेटियों को खेल के मैदान से क्यों ना दूर रखें? ऐसी परिस्थिति में हमारे देश की महिला खेल प्रतिभाओं के साथ अन्याय होगा। और 1947 तक विकसित भारत के लक्ष्य को कभी पाया नहीं जा सकेगा। अत: महिलाओं की शिकायत को प्राथमिकता देते हुए उचित हल निकाला जाना जरूरी है।

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