खिलाड़ियों के सम्मान और अधिकार की आवाज बने वरिष्ठ खेल पत्रकार जसवंत क्लॉडियस — उत्कृष्ट खिलाड़ी पुरस्कारों की घोषणा में देरी से टूट रहा खेल प्रतिभाओं का मनोबल

खिलाड़ियों के सम्मान और अधिकार की आवाज बने वरिष्ठ खेल पत्रकार जसवंत क्लॉडियस — उत्कृष्ट खिलाड़ी पुरस्कारों की घोषणा में देरी से टूट रहा खेल प्रतिभाओं का मनोबल

खेल प्रतिभाओं के धैर्य की परीक्षा आखिर कब तक? प्रतिवर्ष हो उत्कृष्ट खिलाड़ी और खेल पुरस्कारो की घोषणा

(विशेष आलेख… जसवंत क्लॉडियस, वरिष्ठ खेल पत्रकार)

रायपुर : बचपन में माता-पिता, अभिभावक, DD शिक्षक जब बच्चों को खेल मैदानों में लेकर जाते हैं तथा उनमें जो उत्साह नजर आता है वह खेल भावना को मज़बूत करता है । खेलकूद में आगे बढ़ते हुए यही प्रतिभाएं अपने मेहनत के द्वारा लक्ष्य को प्राप्त करने लगती हैं। इससे खिलाड़ी के जीवन में सफलता के पंख लग जाते हैं फिर क्या प्रशिक्षक, क्या माता-पिता, क्या रिश्तेदार, क्या अभिभावक, क्या स्वयं खिलाड़ी सपने बुनने लगते हैं।

देश के लिए खेलना, पदक जीतना फिर आगे चलकर अच्छी नौकरी, बड़ी पुरस्कार राशि, सम्मान, मकान खिलाड़ी की चाहत बन जाती है। बस इसी छुपी चाहत की वजह से कोई भी खेल प्रतिभा अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दुनियां के सामने प्रस्तुत करता है। लेकिन दूसरे खेलों के खिलाडिय़ों को चैंपियनशिप जीतने के तुरंत बाद मिलने वाली आर्थिक सहायता से वंचित होने वाले प्रतिभागियों का खेल प्रभावित होता जाता है। वास्तव में खेल प्रतिभाओं को उनके द्वारा प्राप्त उपलब्धि से कभी भी वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

ताज्जुब की बात है कि इस तरह के खेलों के अधिकांश अभिभावक रिक्शाचालक, मेकेनिक, घर की साफ सफाई करने वाले, माली, छोटा राशन दुकान चलाने वाले, दिहाड़ी के आधार पर माल ढोने वाले, निजी दुकानों में काम करने वाले होते हैं। अब बताइये उन बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए छत्तीसगढ़ के इन अभिभावकों ने अपने खेल प्रतिभा सम्पन्न बच्चों के खेल सामग्री, पोशाक, खान-पान के लिए क्या कुछ उपलब्ध नहीं कराया होगा? कई अभिभावकों ने अपना पसीना बहाकर बच्चों की आवश्यकता को पूरा किया होगा। कुछ ने समाज से मदद ली होगी, कुछ ने पास-पड़ोस से उधारी ली होगी। अब बताइये भला उनके मेहनत का फल उन्हें यही मिला कि जो खेल प्रतिभाएं छत्तीसगढ़ का नाम देश-विदेश में फैला रही है उन्हें उनके हक से वंचित किया जा रहा है।

एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत को विश्व खेल मंच पर स्थापित करना चाहते हैं। दूसरी तरफ सुविधाएं, सम्मान के अभाव में छत्तीसगढ़ की प्रतिभाएं घर बैठने को मजबूर हैं। गनीमत है कि प्रधानमंत्री मोदी जी के खेलो इंडिया मिशन का लाभ छत्तीसगढ़ की प्रतिभाओं को मिल रहा है जिसकी वजह से नई खेल प्रतिभाओं के मैदान में आने का क्रम जारी है। अगर केंद्र सरकार द्वारा यह बहुउद्देशीय योजना खेलो इंडिया मिशन नहीं होता तो संभव है कई अभिभावक अपने दुलारों को खेल मैदान की तरफ देखने से भी मना कर देते।

छत्तीसगढ़ सरकार को अपनी खेल नीति को ध्यान में रखते हुए उसके अनुसार त्वरित निर्णय लेना चाहिए और खिलाडिय़ों को 2026 के खेल दिवस 29 अगस्त 2026 के पहले उनका हक सौंप देना चाहिए। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात अधिकांश खेलों में पदक जीतने वाले खिलाडिय़ों के साथ आज भी न्याय नहीं हुआ है। हा, यह सही है कि 2018 से 2023 तक के कांग्रेस सरकार के समय से खेल प्रतिभाओं की जो उपेक्षा शुरू हुई वह भाजपा शासनकाल में कम होती जा रही है। लेकिन पिछले 2017 से उत्कृष्ट खिलाडिय़ों की घोषणा को जिस तरह शासन-प्रशासन द्वारा रोका गया है उससे लगता है खेल विभाग को इसका अनुमान नहीं है कि इसी वजह से प्रदेश के अनेकों खेल प्रतिभाओं ने खेल मैदानों को टाटा, बाय-बाय कह दिया है।

क्रिकेट, टेनिस, बैडमिंटन, टेबलटेनिस, तैराकी, साइक्लिंग आदि कुछ ऐसे खेल हैं जिनसे आर्थिक रूप से सम्पन्न खिलाडिय़ों के अभिभावक जुड़े हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के जिन खिलाडिय़ों ने बास्केटबाल, साफ्टबाल, सायकल पोलो, एथलेटिक्स, व्हालीबाल, मलखंब, योगासन, फुटबाल, भारोत्तोलन, शक्तितोलन आदि खेलों में राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गौरव हासिल किया है उनकी आर्थिक स्थिति पर नजर डालने से स्पष्ट हो जाएगा कि ऐसे खेलों के प्रतिभाओं को राज्य शासन या निजी संस्थानों ने क्या मदद की है?अतः समय ठोस निर्णय लेने का है ताकि 2036 के ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों के दल में छत्तीसगढ़ के खिलाड़ी शामिल हो।

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