राष्ट्रीय भारोत्तोलन स्पर्धा-2026 : ज्ञानेश्वरी यादव ने जीता स्वर्ण पदक, ओलंपिक में छत्तीसगढ़ की प्रतिभा पदक जीतने के करीब
रायपुर : समूह खेल और एकल खेल में सफलता या असफलता का अर्थ एक ही होता है। जहां तक श्रेय लेने की बात आती है तो एकल खेल में भाग लेने वाले प्रतिभागी की उपलब्धि के लिए उसकी मेहनत, परिश्रम, अनुशासन, त्याग, पक्का इरादा जिम्मेदार होता है जबकि समूह खेल में मिली सफलता के लिए टीम के सभी प्रतिभागियों का सामूहिक प्रदर्शन इसके लिए शाबासी प्राप्त करता है। आधुनिक ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में शामिल 28 कोर गेम्स में भारोत्तोलन भी शामिल है।
यह एकल खेल है. सिडनी 2000 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में भारत की कर्णम मल्लेश्वरी ने 67 कि.ग्रा. वजन वर्ग में कांस्य पदक जीता और इसके साथ ही हमारे देश में यह खेल तेजी से लोकप्रिय हो गया। भारोत्तोलन खेल मानव सभ्यता का बहुत ही पुराना खेल है। हम कह सकते हैं कि प्राचीन काल में मिस्र तथा यूनान में मकान, दीवाल, पुल, सड़क आदि के निर्माण के समय जब वजनी पत्थर, लकड़ी आदि को उठाने के लिए आधुनिक युग की तरह भारी-भरकम मशीन नहीं थी तब मनुष्य स्वयं आपसी समझ से यह कार्य करता था। धीरे-धीरे इस शक्ति प्रदर्शन के स्वरूप ने भारोत्तोलन नामक खेल को जन्म दिया।
इस खेल के महत्व और प्रसिद्धि को इस तथ्य से साबित किया जा सकता है कि यह खेल 1896 के पहले आधुनिक ओलंपिक खेलों में सम्मिलित कर लिया गया। हमारे देश के भारोत्तोलकों को सबसे पहले 2000 के सिडनी ओलंपिक खेलों में भाग लेने योग्यता हासिल हुई। पहले ही ओलंपिक खेल में भाग लेकर भारत की कर्णम मल्लेश्वरी ने जिस तरह कांस्य पदक जीता उससे इस खेल ने भारतीय युवाओं के दिल में जगह बना ली। इसके प्रभाव से छत्तीसगढ़ की प्रतिभाएं भी उभरकर आई।
अब स्थिति यह है कि इस खेल में छत्तीसगढ़ की ज्ञानेश्वरी यादव ने 53 किग्रा वर्ग में स्वर्ण पदक जीता है। राजनांदगांव में एक छोटी सी जगह में अभ्यास आरंभ करके ज्ञानेश्वरी ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई फिर छत्तीसगढ़ की सरकार ने उन्हें पुलिस विभाग में नियुक्ति दी। इन दिनों वह एशियाई खेलों, ओलंपिक खेलों में भारत की तरफ से विश्व योग्यता हासिल करने के लिए इंडिया कैंप में रात-दिन पसीना बहा रही है। छत्तीसगढ़ की खेल नगरी राजनांदगांव में भारोत्तोलन के प्रति समर्पण, नियमित अभ्यास, अनुशासन के साथ पली बढ़ी अपने राज्य के साथ भारत देश का नाम रौशन करने की चाहत के कारण अखिल भारतीय पुलिस सेवा का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने राष्ट्रमंडल भारोत्तोलन चैंपियनशिप में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया है।
2026 की सीनियर राष्ट्रीय स्पर्धा में ज्ञानेश्वरी ने 53 किग्रा वर्ग में 186 किलोग्राम स्नैच में 83 किग्रा, क्लीन व जर्क 103 किग्रा वजन उठाकर स्वर्ण पदक जीता। एक साधारण परिवार की ज्ञानेश्वरी यादव ने पिछले सात वर्षों से भारोत्तोलन के लिए अपने आपको समर्पित कर दिया और आर्थिक तंगी के बावजूद राजनांदगांव के खेलप्रेमियों के सहयोग साथ ही केंद्र सरकार, केन्द्रीय खेल मंत्रालय तथा भारतीय खेल प्राधिकरण नई दिल्ली के सहयोग से आज विश्व में उन्हें चौथी वरीयता प्राप्त है।
भारत में भारोत्तोलन के खेल में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। 2000 सिडनी ओलंपिक के बाद 2020 में मणिपुर की मीराबाई चानू ने टोक्यो 2020 में रजत जीता है। उनके अलावा कुंजरानी देवी, जेरेमी लालरिनुंगा, संगीता चानू, सतीश शिवलिंग और रागला वेंकट राहुल ने भी भारोत्तोलन में भारत का नाम रौशन किया है। छत्तीसगढ़ में उचित प्रशिक्षण व सुविधा मिलने पर अनेक छिपी हुई प्रतिभाएं सामने आ सकती है।
विशेष लेख : जसवंत क्लॉडियस, वरिष्ठ खेल पत्रकार

